शिक्षण के सूत्र – Maxims of Teaching – Deled Semester Exams

शिक्षण के सूत्र – Maxims of Teaching

शिक्षण के सूत्रों के प्रयोग से शिक्षण प्रकिया को प्रभावशाली और रोचक बनाया जा सकता है| शिक्षण के सूत्र टॉपिक DELED first semester, TET तथा CTET आदि के छात्रों के लिए अति महत्वपूर्ण है|
   

शिक्षण के सूत्र - Maxims of Teaching

शिक्षण के सूत्र

शिक्षकों के अनुभवों और विभिन्न शिक्षाशास्त्रियों की अपनी समझ और दार्शनिक परिपेक्ष्य पर आधारित वो सुझाव जो शिक्षण अधिगम की प्रक्रिया को एक खास संकेत तथा दिशा प्रदान करते हैं, शिक्षण सूत्र कहलाते हैं। 

रेमंट के अनुसार

शिक्षण सूत्र उन तरीकों को बताते हैं जिससे यह आशा की जाती है कि सिद्धांत प्रयोग में सहायक होंगे।  


फ्रोबेल के अनुसार

शिक्षण का उद्देश्य है अधिक से अधिक पाना न कि अधिक से अधिक खोना। शिक्षण सूत्र बच्चों को अधिक से अधिक ग्रहण करने के योग्य बनाते हैं।   

कुछ प्रमुख शिक्षण सूत्र

  1. सरल से जटिल की ओर 
  2. ज्ञात से अज्ञात की ओर 
  3. स्थूल से सूक्ष्म की ओर 
  4. पूर्ण से अंश की ओर 
  5. अनिश्चित से निश्चित की ओर 
  6. प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष की ओर 
  7. विशिष्ट से सामान्य की ओर 
  8. विश्लेषण से संश्लेषण की ओर 
  9. मनोवैज्ञानिक से तर्कसंगत की ओर 
  10. अनुभूत से युक्ति-युक्त की ओर 
  11. प्रकृति का अनुसरण 


सरल से जटिल की ओर


इस विधि की ओर सर्वप्रथम हरबर्ट ने ध्यान दिया था। इस सूत्र के अनुसार बालक को विषय को पढ़ाते समय पहले सरल पाठ पढ़ाना चाहिए तथा बाद में कठिन पाठ पढ़ाना चाहिए। 

 
उदहारण :-फूल के भागों का वर्णन करने से पूर्व हम बालक को फूल के बारे में जानकारी देंगे। 

ज्ञात से अज्ञात की ओर

इस सूत्र के अनुसार बालक को किसी विषय को पढ़ाने से पूर्व शिक्षक को उस विषय से सम्बंधित बालक के पूर्व ज्ञान को मालूम कर लेना चाहिए। बालक को इसी पूर्व ज्ञान के सहारे नयी बाते बतानी चाहिए। 

 
उदाहरण :-गणित में लाभ हानि पढ़ाने से पूर्व छात्रों को ये बताना चाहिए कि व्यापारी अपना जीवन यापन कैसे करते हैं। 

स्थूल से सूक्ष्म की ओर

इसे मूर्त से अमूर्त की ओर सूत्र भी कहते हैं। 

इस सूत्र के अनुसार बालक पहले स्थूल का ज्ञान प्राप्त करता है। हम जो कुछ देखते, स्पर्श करते या अनुभव करते हैं वो सब स्थूल है। 
 
अब शिक्षक को चाहिए कि इसी स्थूल को आधार बनाकर वह छात्र को धीरे-धीरे सूक्ष्म को ओर ले जाय। 
 
उदाहरण :-बच्चे को 1 और 7 का जोड़ 8 होता है सिखाने के लिए 1+7=8 बताने से पूर्व उसे कंचों के माध्यम से 1 और 7 का जोड़ सिखाना चाहिए। 

पूर्ण से अंश की ओर

इस सूत्र के अनुसार बालक पहले पूर्ण वस्तु का ज्ञान प्राप्त करता है, उसके अंगो का नहीं। यह सूत्र मनोविज्ञान के एक सिद्धांत Gestalt Theory पर आधारित है। 

 
उदाहरण :-कम्प्यूटर पढ़ाते समय बालक को पहले कम्प्यूटर के बारे में बताएँगे तब हम बालक को कम्प्यूटर के भाग के बारे में बताएँगे। 


अनिश्चित से निश्चित की ओर

इस सूत्र के अंतर्गत शिक्षण को अस्पष्ट और अनियमित ज्ञान को क्रमशः स्पष्ट एवं नियमित करना होता है। 

 
शिक्षक को चाहिए की वो बालक को स्पष्ट व् नियमित जानकारी प्रदान करे, गलत तथ्यों को सही रूप में बताये तथा बालक की अनिश्चित धारणाओं तथा विचारों को निश्चयात्मकता प्रदान करे।

प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष की ओर

इस सूत्र के अनुसार बालक को पहले को पहले उन वस्तुओं का ज्ञान देना उचित है जो उसके प्रत्यक्ष हैं अर्थात जो उसके सामने हैं।  तत्पश्चात उन्हें अप्रत्यक्ष वस्तुओं का ज्ञान देना चाहिए।

 
उदाहरण :- यदि हमें बालक को अकबर की शासन प्रणाली के बारे में बताना है तो पहले हमें बालक को आधुनिक शासन प्रणाली के बारे में बताना होगा। 


विशिष्ट से  सामान्य की ओर


इस सिद्धांत के अनुसार पाठ पढ़ाते समय शिक्षक को पहले विशिष्ट दृष्टान्तों एवं उदाहरणों को बालक के समक्ष प्रस्तुत किया जाय इसके बाद इन विशिष्ट दृष्टान्तों एवं उदाहरणों के माध्यम से बालक को सामान्य नियमों तक पहुंचने के लिए प्रेरित किया जाय। 
 
इस सिद्धांत द्वारा प्राप्त ज्ञान स्थायी होता है तथा बालक को बौद्धिक एवं तार्किक शक्ति प्रदान करता है। 

विश्लेषण से संश्लेषण की ओर

विश्लेषण वह प्रक्रिया है जिसमे हम वस्तु का सम्पूर्ण अध्ययन प्रारम्भ करते है फिर उसे विभिन्न तत्वों में बाटकर प्रत्येक भाग का अलग अलग अध्ययन करते हैं। 
 
जबकि संश्लेषण का अर्थ है कि किसी वस्तु के विभिन्न भागों से आरम्भ करके सम्पूर्ण वस्तु की ओर चलना। 
 
इस प्रणाली का प्रयोग भूगोल, रेखागणित, विज्ञान तथा व्याकरण आदि के शिक्षण में किया जाता है। 

मनोवैज्ञानिक से तर्क संगत की ओर

बालक को शिक्षा देने के दो क्रम हैं – मनोवैज्ञानिक तथा तर्कसंगत। तर्कसंगत क्रम में विषय को तार्किक ढंग से विभाजित कर बालक के सामने रखा जाता है जबकि मनोवैज्ञानिक ढंग में बालकों की रूचि , जिज्ञासा , उत्साह , आयु व् ग्रहण शक्ति के आधार पर विषय को बालक के सामने रखा जाता है। 
 
आधुनिक विचारधारा मनोवैज्ञानिक क्रम को महत्त्व देती है। अतः शिक्षक को मनोवैज्ञानिक क्रम से तर्कसंगत क्रम की ओर चलना चाहिए। 

अनुभूत से युक्ति-युक्त की ओर

शिक्षण अधिगम प्रक्रिया का आरम्भ ठोस अनुभवों से किया जाना चाहिए क्योंकि ठोस अनुभूत सत्यों की अनुभूति के बाद ही युक्ति-युक्त चिंतन आता है। 
 
शिक्षक को चाहिए कि वह बालकों के समक्ष प्रत्यक्ष उदहारण प्रस्तुत कर उन्हें तर्कयुक्त बनाने का प्रयास करें। 

प्रकृति का अनुसरण

इसे नैसर्गिक विधि भी कहते हैं। इस सूत्र के अनुसार शिक्षक को चाहिए कि वह बालक कि मानसिक एवं शारीरिक प्रकृति के अनुसार ही उसे शिक्षण प्रदान करे। यदि शिक्षक ऐसा नहीं करता है तो बालक के विकास में बाधा उत्पन्न होती है। 

रेमंट के अनुसार 

इस सूत्र का यथार्थ अभिप्राय यह है कि हमको अपने साधनों को बालक के शारीरिक और मानसिक विकास के अनुरूप बनाना चाहिए।  

Leave a Comment